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Wednesday, May 4, 2011

यूँही नहीं कहते हैं तुझे ज़िन्दगी...


बड़ा मज़ा आता है तुझे,
अपने साथ सबको नचाने में,
बड़ा मज़ा आता है तुझे,
हर पल नया करतब दिखाने में,
यूँही नहीं कहते हैं तुझे ज़िन्दगी,
कुछ बात तो है तेरी अदाओं में!!

अपने इशारों पर नचाके सबको,
अपने साथ बहा ले जाती है,
मंजिल का तो पता नहीं,
लेकिन रास्ते बड़े मजेदार दिखाती है,
यूँही नहीं कहते हैं तुझे ज़िन्दगी,
कुछ बात तो है तेरी अदाओं में!!

सब कोसते हैं वक़्त और हालात को,
लेकिन भूल जाते हैं, तू जो रास रचाती है..
तेरी लीलाओं के घिरे में जो फँस चला,
बेचारा बस बहता चला गया,
यूँही नहीं कहते हैं तुझे ज़िन्दगी,
कुछ बात तो है तेरी अदाओं में!!

सोचने का क्या है, हम सभी सोचते हैं,
सपनों का क्या है, हम सभी देखते हैं,
लेकिन तुरूप का इक्का तो तेरे ही पास है,
यूँही नहीं कहते हैं तुझे ज़िन्दगी,
कुछ बात तो है तेरी अदाओं में!!

पर हर वक्त इक्के का नहीं होता,
कभी कभी ग़ुलाम भी कुछ कम नहीं होता,
जहां कोई कुछ न कर पाया,
वहाँ हम जैसा ग़ुलाम ही काम आया,

कम ना समझना हमें भी तू,
एक दिन हमने रास ना रचाया तो कहना,
अपनी लीलाओं में तुझे ना उलझाया तो कहना...!!

माना यूँही नहीं कहते हैं तुझे ज़िन्दगी,
लेकिन अदाएं रचना की भी कुछ कम नहीं!!